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श्रीविष्णुसहस्त्रनाम

किसी भी कष्ठ/पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें .. निश्चित लाभ मिलेगा । कुंडली मे कोई भी ग्रह क्यो न निर्बल हो, श्रीविष्णुसहस्त्रनाम उन ग्रहो के अशुभफलो को दुर कर देता है।

श्रीविष्णुसहस्त्रनाम भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाया था।

य इदं श्रृणुयानिन्नत्यं यश्चापि परिकीर्तयेत ।
नाशुभं प्राप्नुयात किञ्चित् सोsमुत्रेह च मानव ।।

अर्थात जो मनुष्य श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करता है, तथा श्रवण करता है, उसका इस लोक में, तथा परलोक में, कहीं कुछ अशुभ नही होता ।

धर्मार्थी प्राप्नुयात धर्ममथार्थी चार्थमाप्नुयात ।
कामानवाप्नुयात कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात प्रजां ।।

यहां एक तरह से विष्णुसहस्रनाम को मनोकामना सिद्धि पाठ बताया गया है, यहां भीष्म जी ने युधिष्ठिर को कहा है, की जो व्यक्ति भगवान विष्णु के सहस्त्रनामो का जाप/श्रवण करता है, उसकी प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है, जिसे धर्म चाहिए होता है, उसे धर्म मिलता है, जिसे भोग चाहिए होता है, उसे भोग प्राप्त होता है । संतान की इच्छा रखने वाला संतान पाता है ।

भक्तिमान यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नामनमेतत् प्रकितर्त्येत
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्तयनुत्तम ।।
न भयं क्वाचिदाप्नोति वीर्य तेजश्च विन्दति ।
भवत्ययरोगो द्युतिमान बलरूपगुणावन्ति ।।

जो भक्तमान पुरूष सदा प्रातः काल मे उठकर स्नान करके पवित्र हो, मन मे श्री विष्णु का ध्यान करते हुए इस वासुदेव श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्रोत्र का पाठ करता है, वह महान यश् पाता है, अपनी जाति में महत्व पाता है, अचल संपत्ति पाता है, तथा उसको कहीं भय नही होता । वह वीर्य और तेज को पाता है , तथा आरोग्यवान, कांतिमान , बलवान, रूपवान, ओर सर्वगुणसम्पन्न हो जाता है ।

जिसको कोई रोग होता है, उसका रोग छूट जाता है, बंधन से पड़ा हुआ पुरुष बंधन से टूट जाता।

जो भक्तिसम्पन्न होकर श्री विष्णु सहस्रनाम का जाप करता है, वह शीघ्र ही समस्त संकटों से मुक्त हो जाता है । श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने वाले को आत्मसुख , क्षमा, लक्ष्मी, धैर्य, स्मृति और कीर्ति को पाता है ।

स्वर्ग, चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, आकाश, दश दिशाएं, पृथ्वी और महासागर यह सब कुछ भगवान विष्णु ने अपने प्रभाव से धारण किये गए है । देवता, गंदर्भ, यक्ष, सर्प, और राक्षस सहित यह स्थावर जंगमरूप सम्पूर्ण जगत श्रीविष्णु के अधीन है । इन्द्रिया, मन, बुद्धि, सत्व, तेज, बल, धीरज, शरीर, आत्मा सब वासुदेव के रूप है,

ऋषि पितर देवता पंच महाभूत ,यह सब नारायण के ही अधीन है। जो पुरुष सारे सुख चाहता है, वह विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

( समस्त संदर्भ – महाभारत )

राम राम जी

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