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भगवान नरसिंह जयंती 2020

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6 मई बुधवार यानी हिंदू कैलेंडर के अनुसार वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि है। काशी के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्रा के अनुसारइस दिन को नरसिंह प्रकट दिवस या नरसिंह जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

ये भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों में चौथा अवतार है। इस तिथि पर पूरे दिन व्रत रखा जाता है और भगवान नरसिंह की पूजा की जाती है। पद्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के इस रौद्र रुप की पूजा करने से पाप खत्म हो जाते हैं और परेशानियां भी दूर होती हैं।

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व्रत व पूजा विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठकर तीर्थ स्नान किया जाता है। अभी ये संभव नहीं है, इसलिए घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहा लेना चाहिए। इस दिन नदी, तालाब या घर पर ही वैदिक मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल लेकर उनसे सब पापों की शांति के लिए विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। इसके बाद पूरे घर में गंगाजल या गौमूत्र का छिड़काव करना चाहिए। फिर भगवान विष्णु के नरसिंह रूप की पूजा करनी चाहिए।

पूजा से पहले ही पूरे दिन व्रत और श्रद्धा अनुसार दान देने के लिए संकल्प लेना चाहिए। व्रत में दिनभर गुस्सा नहीं करना चाहिए और नहीं सोना चाहिए। एक समय ही भोजन करना चाहिए। शाम को सूर्यास्त के पहले नहाकर फिर भगवान नरसिंह की विशेष पूजा और अभिषेक करें। इसके बाद प्रसाद बांटे।

पूजा की विधि

  • नृसिंह चतुर्दशी की सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद व्रत के लिए संकल्प लें।
  • इसके बाद संध्या समय पूजा स्थान पर चावल रखकर उनपर कलश स्थापित करें।
  • कलश पर या पास में ही भगवान नरसिंह की मूर्ति या तस्वीर रखें।
  • पंचामृत, दूध और गंगाजल से भगवान नरसिंह का अभिषेक करें।
  • इसके बाद चंदन चढ़ाएं फिर सभी तरह की पूजन सामग्री चढ़ाएं।
  • भगवान नरसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल अर्पित करें।
  • फिर धूप-दीप दिखाएं। भगवान को भोग लगाएं और आरती करें।
  • इसके बाद सभी को प्रसाद बांट दें और उसके बाद खुद प्रसाद लें।

नरसिंह जयंती की कथा क्या है?

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी के हिरण्यकश्यप और हरिनाक्ष नाम के दो पुत्र थे। हरिनाक्ष भगवान विष्णु द्वारा देवी पृथ्वी को बचाने के लिए मारा गया था। हरिण्याक्ष की मृत्यु का बदला लेने के लिए, हिरण्यकश्यप ने बड़ी तपस्या और कठिनाइयों के साथ भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने का निर्णय लिया। अंत में, वह देवता को प्रसन्न करने में सफल रहा और उसने एक विशेष वरदान भी प्राप्त किया।

हिरण्यकश्यप बहुत शक्तिशाली हो गया और अपनी सभी शक्तियों के साथ उसने तीनों लोकों और यहां तक कि स्वर्ग को जीतना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि देवता भी हिरण्यकश्यप को पराजित करने में असमर्थ थे क्योंकि उसे प्राप्त वरदान के कारण वह सुरक्षित था। उस अवधि के दौरान, हिरण्यकश्यप को प्रहलाद नाम का एक पुत्र प्राप्त हुआ, जो देवता भगवान विष्णु का दृढ़ भक्त था।

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद का भक्ति की तरफ से ध्यान हटाने का अथक प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। हिरण्यकश्यप के सभी प्रयास विफल हो रहे थे क्योंकि प्रह्लाद भगवान विष्णु की पूजा करने के प्रति गहरा समर्पित था। प्रह्लाद की दृढ़ भक्ति के कारण, भगवान नारायण उसे सभी प्रकार के अत्याचारों और खतरे से बचाते थे।

एक बार हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को जलाने के उद्देश्य से होम का आयोजन किया। इसलिए उसने उसे होलिका नाम की अपनी बहन की गोद में बैठाया । उसे आग से हानि न पहुँचने का विशेष वरदान प्राप्त था। होलिका को एक कपड़े (शॉल) से सम्मानित किया गया जो उसे आग से बचा सकता था। जब आग बढ़ गई और भड़क उठी, तब वह दिव्य कपड़ा होलिका से दूर उड़ गया और प्रह्लाद को भगवान नारायण के आशीर्वाद से ढक दिया। प्रह्लाद बच गया और होलिका आग में जल गई और उस दिन के बाद से भक्त होलिका दहन के दिन को काफी उत्साह के साथ मनाते हैं।

अंत में, क्रोध में, उसने प्रह्लाद को अपने भगवान के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए चुनौती दी। इसके लिए, प्रह्लाद ने उल्लेख किया कि देवता हर जगह और हर चीज में हैं, यहां तक कि स्तंभों में भी। क्रोध में, हिरण्यकश्यप खंभे पर प्रहार करने के लिए आगे बढ़ा। अचानक, भगवान विष्णु ‘नरसिम्हा’ के अवतार रूप में स्तंभ से बाहर आए। तब भगवान विष्णु ने अपने डरावने रूप में प्रकट होकर हिरण्यकश्यप का वध किया। उस दिन के बाद से, इस दिन को नरसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है।

भगवान नरसिंह की पूजा का महत्व
पद्म पुराण और अन्य धर्म ग्रंथों के अनुसार, वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान नरसिंह की पूजा करने से हर तरह की इच्छा पूरी होती है। इसके साथ ही बीमारियां खत्म होती है और दुश्मनों पर जीत मिलती है। पुरणों के अनुसार इस पर्व पर व्रत, दान और पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

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