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काशी विश्वनाथ मन्दिर

कुम्भ के अवसर पर जानिए प्रयागराज के निकट काशी के सबसे प्रमुख मंदिर काशी विश्वनाथ के बारे में।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ के दरबार में वाम रूप में स्थापित बाबा विश्वनाथ शक्ति की देवी मां भगवती के साथ विराजते हैं। यह अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

पुराणों के अनुसार विश्वनाथ जी ही लिंगअधिपति हैं एवं पंचक्रोशी यात्रा में पड़ने वाले प्रधान हैं। भगवान शिव को काशी अति प्यारी है। इसलिए भोलेनाथ काशी को छोड़कर कभी नहीं जाते। इस पर एक दोहा भी प्रचलित है जिसे काशी वासी अक्सर दुहाराते रहते हैं।

चना चबैना गंग जल जो पुरवै करतार।

काशी कबहुं न छोड़िये विश्वनाथ दरबार।।

मान्यता के अनुसार 6वीं शताब्दी में जब गुप्तवंश का शासन था उसी समय विश्वेश्वर के प्रचीन शिवायतन की स्थापना हुई थी जो बाद में कालचक्र प्रवाह में लुप्त हो गया। जिसके काफी समय बाद 14वीं शताब्दी में इस शिवायतन का पुनर्निर्माण कराया गया। विदेशी शासकों का जब भारत पर प्रभुत्व हुआ तो उसका प्रभाव धर्म और मंदिरों पर भी पड़ा। जौनपुर के शर्की बादशाहों ने 1436-1448 के मध्य विश्वनाथ मंदिर को तोड़वा दिया।बाद में मुगल शासक अकबर के शासनकाल में हुए राजा टोडरमल के समय में पं0 नारायण भट्ट ने विश्वनाथ मंदिर निर्माण कर शिवलिंग की स्थापना कराया। लेकिन जब कट्टर मुगल शासक औरंगजेब गद्दी पर बैठा तो उसने हिन्दुओं की आस्था यानी मंदिरों पर कुठाराघात करना शुरू कर दिया और मंदिर ध्वस्त करने के क्रम में औरंगजेब के निर्देश पर 2 सितम्बर 1669 को काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त कर दिया गया। मान्यता के अनुसार उस दौरान शिव ज्ञानवापी के पास स्थित कुंए में कूद पड़े थे। ऐसे में श्रद्धालु इसी कुंए में भगवान शिव का जलाभिषेक किया करते थे।एक किंवदंती के अनुसार यहां के पंडों ने बाबा विश्वनाथ को कुंए से निकाल लिया था। बाद में बाबा विश्वनाथ की अनुकंपा से इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 1777 में वर्तमान विश्वनाथ जी के मंदिर का निर्माण करवाया।1839 में लाहौर के महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर पर सोने की चादर चढ़वाया। जिसका आधार तांबे का है। माना जाता है कि करीब 2.5 मन सोना सोने की पर्त में प्रयोग किया गया है। मंदिर के शिखर पर जब सूर्य की रोशनी का मिलन होता है तो पूरा मंदिर चमक उठता है। इस दौरान ऐसा लगता है जैसे सूर्यदेव बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने आये हैं।बाबा विश्वनाथ मंदिर में गर्भगृह के ठीक सामने नंदी बैल है। जिसे नेपाल नरेश ने स्थापित करवाया था।

आईये अब आपको इस मंदिर के उन तथ्यों से अवगत कराते हैं जिसके वजह यह मन्दिर विश्व मे प्रसिद्ध है।
काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े तथ्य।
  1. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो भागों में है। दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं। दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं। इसीलिए काशी को मुक्ति क्षेत्र कहा जाता है।
  2. देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है। यहां मनुष्य को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है। भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को तारते हैं। अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा सकता।
  3. श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं। इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं, जो अद्भुत है। ऐसा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।
  4. विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है। इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है। तांत्रिक सिद्धि के लिए ये उपयुक्त स्थान है। इसे श्री यंत्र-तंत्र साधना के लिए प्रमुख माना जाता है।
  5. बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार इस प्रकार हैं :-
    1. शांति द्वार।
    2. कला द्वार।
    3. प्रतिष्ठा द्वार।
    4. निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है। पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हों और तंत्र द्वार भी हो।
  6. बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में मौजूद है। इस कोण का मतलब होता है, संपूर्ण विद्या और हर कला से परिपूर्ण दरबार। तंत्र की 10 महा विद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है।
  7. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण मुख पर है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की ओर है। इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है। इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है। यहां से प्रवेश करते ही पूर्व कृत पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं।
  8. भौगोलिक दृष्टि से बाबा को त्रिकंटक विराजते यानि त्रिशूल पर विराजमान माना जाता है। मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी। इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा स्वयं विराजते हैं। मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है। इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता।
  9. बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराज मान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।
  10. बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं। मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।
  11. बाबा विश्वनाथ के अघोर दर्शन मात्र से ही जन्म जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं। उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं।

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