Hindu Gods · Religion

श्रीनाथ जी और उनका मंदिर, गोवर्धन

shreenath ji Goverdhan

श्री गर्ग संहिता यदुकुल के महान आचार्य महामुनि श्री गर्गजी महाराज की रचना है। जो अब से लगभग 5040 वर्ष पूर्व इनके द्वारा सृजित की गयी थी। श्री गर्ग संहिता के ‘श्रीगिरिराज खण्ड’ में श्री गिरिराज गोवर्द्धन के तीन शिखरों का वर्णन किया गया है। काल क्रम से उत्तर दिशा का आदि श्खिर और दक्षिण दिशा का देव शिखर भूमिगत हो चुके हैं। वर्तमान में श्री गिरिराज जी का जो दर्शन होता है वह मध्य वाला ब्रह्म शिखर है। इसी खण्ड के सातवें अध्याय में श्री गिरिराज जी के तीर्थो का वर्णन किया गया है। जिसमें श्लोक सं0 30 से 37 तक में भारत वर्ष के चारों कोनों पर भगवान के चार नाथ क्रमशः श्री जगन्नाथ, श्री रंगनाथ, श्री द्वारकानाथ और बद्रीनाथ का तथा मध्यभाग में श्री गिरिराज जी पर श्री श्रीनाथ जी का दर्शन होता है ऐसा वर्णन किया गया है।

श्री श्रीनाथजी भी इसी कालक्रम का अनुसरण करते हुए किसी अपने भक्त को श्रेय देते हुए उसके कर कमलों के माध्यम से भिमगत हो गये। मानव के जीवन में प्रत्येक वर्ष व प्रत्येक दिन की अवधि में क्रमशः चारों युगों का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार सत्व, रज व तम गुण भी प्रत्येक जीव पर प्रत्येक दिवस अपना प्रभाव दिखाते हैं, तभी प्राणी शुभाशुभ कार्य करता है।

कलियुग में भी जब द्वापर का प्रभाव हुआ तभी परब्रह्म श्रीकृष्ण ही श्री श्रीनाथजी के रूप में प्रकट हुए। पुष्टिमार्गीय ग्रंथों में किये गये वर्णन के अनुसार श्री गिरिराज गोवर्धन की कन्दरा से सम्वत् 1466 वि0 के श्रावण कृष्णा तृतीया आदित्यवार को सूर्योदय काल के श्रवण नक्षत्र में श्री श्रीनाथजी की ऊर्द्धभुजा का दर्शन हुआ। सम्वत् 1535 वि0 के वैशाख कृष्णा एकादशी गुरूवार को शतभिषा नक्षत्र के मध्याह्न अभिजित मुहूर्त में श्री श्रीनाथजी के मुखारबिंद के दर्शन हुए। इसी दिन इसी तिथि नक्षत्र मुहूर्त में जगद्गुरू श्री वल्लभाचार्यजी का भी अग्नि कुण्ड से प्राकट्य हुआ था। इसी कालावधि में कृष्णावतार के सभी सखा गणों के द्वारा जैसे ब्रजवासियों के यहाँ जन्म लिया गया था, जिनके साथ श्री कृष्ण के द्वारा लीला सम्पादित हुयी ठीक वैसे ही अष्टसखा श्री श्रीनाथजी के प्रकट हुए और श्री श्रीनाथजी के द्वारा भी वही बाल लीलाओं का सम्पादन किया गया जो उन्होंने द्वापर युग में की थी।

विक्रमी सम्वत् 1550 के लगभग महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी अपनी प्रथम पृथ्वी परिक्रमा को श्री हरि प्रेरणा से झारखण्ड में रोककर ब्रज में पधारे। इस समय तक श्री श्रीनाथजी अपने देवदमन, नागदमन, गोवर्धननाथ आदि नामों से प्रसिद्ध होकर आन्यौरवासी मानिकचन्द पाण्डेय, सद्दू पाण्डेय आदि के द्वारा एक चबूतरे पर पधारकर पूजे जाते थे। सम्वत् 1549 विक्रमी में गौड़ीय सम्प्रदाय के सन्त श्री माधवेन्द्र पुरी भी ब्रजयात्रा के निमिŸा से यहाँ पधारे थे। जो श्री श्रीनाथजी को गोपाल नाम से पूजते थे।

सम्वत् 1556वि0 में महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी अपनी द्वितीय यात्रा में गोवर्धन भी पधारे तब उन्हें पता चला कि श्रीगिरिराज जी की कन्दरा से कोई भगवान का श्री विग्रह प्रकट हुआ है और जिनकी सेवा माध्व गौड़ीय सम्प्रदाय के संत माधवेन्द्र पुरी गोपाल नाम से करते हैं। महाप्रभुजी ने श्री विग्रह के दर्शनकर उनको श्रीनाथ (गोवर्धननाथ) नाम दिये और एक छोटा सा कच्चा मंदिर बनवाकर उसमें श्री श्रीनाथजी को विराजमान कर दिये। तभी सद्दू पाण्डेय, रामदास चौहान, कुंभनदास आदि को सेवक बनाकर उन्हें श्री श्रीनाथजी की सेवा में रखकर यात्रा को प्रस्थान कर गये।

सम्वत् 1558वि0 में महाप्रभुजी अपनी तृतीय पृथ्वीयात्रा के प्रारंभ में ही गोवर्धन पधारे। तभी श्री हरि की प्रेरणा से अम्बाला के एक धनाढ्य सेठ पूरनमल खत्री ने श्री श्रीनाथजी का विशाल मंदिर बनवाने की योजना को महाप्रभु श्री बल्लभाचार्यजी से निवेदित किया। महाप्रभुजी की अनुमति पाकर

आगरा से वास्तुकला विशेषज्ञ हीरामणि उस्ताद को बुलाकर मंदिर का मानचित्र बनवाया गया और सम्वत् 1559वि0 वैशाख शुक्ला अक्षय तृतीया आदित्यवार को रोहिणी नक्षत्र में मंदिर की नींव का श्री गण्ेश हुआ। मंदिर का निर्माण कुछ माह चलने के उपरान्त द्रव्याभाव हो जाने से रूक गया। चूँकि मंदिर का अधिकांश भाग बन चुका था अतः महाप्रभुजी ने श्री श्रीनाथजी को सम्वत् 1564वि0 में इस अपूर्ण मंदिर में ही विराजमान कर दिया। सत्रह वर्ष पश्चात् पूरनमल खत्री ने व्यापार आदि से अर्जितकर बहुत सा द्रव्य लाकर मंदिर का अवशेष भाग भी पूर्ण करा दिया। तब महाप्रभुजी ने वैशाख शुक्ला तृतीया सम्वत् 1576वि0 में श्री श्रीनाथजी का पटोत्सव कराया।

श्री श्रीनाथजी का मंदिर गिरिराजजी के सघनवनों से आच्छादित ऊपर मध्य भाग में दुमंजिले के रूप में में निर्मित किया गया है। यवनों के आक्रमण से रक्षा के लिये मंदिर की प्रथम मंजिल इस प्रकार गिरिराज शिखर पर बनी है कि दूर से बनी हुयी मंजिल का आभास नहीं होता है। यह मंजिल पूर्णतः पटाव से ढकी है, जिसे गर्भगृह की संज्ञा दी गयी है। इस मंजिल में दूध, घी, तेल आदि सामग्री के भंडार गृह हैं। भोगराग हेतु सामग्री भी इन्हीं कक्षों में तैयार होती थी। द्वितीय मंजिल खुले प्रांगण में है, जिसमें उŸाराभिमुख किये हुए तीन भवन वाला श्री श्रीनाथजी का प्रमुख मंदिर है। दोनों भवनों के उतृंग शिखरों पर फहराती हुयीं पताकायें और ऊपर ब्रजरक्षा करता हुआ सुदर्शन चक्र शुशोभित है।

महाप्रभु श्री बल्लभाचार्यजी ने मंदिर की व्यवस्था हेतु गुजरात के पटेल परिवार के कृष्णदास को उनकी प्रबंध कुशलता, भक्ति भावना एवं साम्प्रदायिक एकनिष्ठ भावना को देखकर अधिकारी बना दिया। अधिकारी कृष्णदास ने बंगालियों को श्री श्रीनाथजी की सेवा से मुक्तकर पूर्णतः मंदिर का प्रबंध व श्री श्रीनाथजी की सेवा का प्रबंध अपने हाथ में ले लिया। काव्यकला और संगीत के मर्मज्ञ कुभनदास, सूरदास, परमानन्ददास, नन्ददास, गोविन्द स्वामी, छीतस्वामी एवं चतुर्भुजदास का एक संकीर्तन मण्डल का रूप देकर उसे श्री श्रीनाथजी के मंदिर में कीर्तन करने हेतु नियुक्त कर दिया। जो कुछ समय बाद अधिकारी कृष्णदास सहित अष्टछाप के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस अष्टछाप की स्थापना गोस्वामी श्री विट्ठलनाथजी ने चार अपने शिष्य नन्ददास, गोविन्द स्वामी, छीतस्वामी व चतुर्भुजदास लिये और चार शिष्य महाप्रभु श्री बल्लभाचार्यजी के लिए जिनके नाम थे कुभनदास, सूरदास, कृष्णदास व परमानन्ददास। यह अष्टछाप भक्ति साहित्य का भंडार परिपूर्ण करने वाला हुआ।

सम्वत् 1576वि0 से लेकर सम्वत् 1727विक्रमी तक यह मंदिर उŸारी भारत के प्रमुख मंदिरों में गिना जाता रहा। अपने वैभव से सुदूर प्रान्तों के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता हुआ अतृप्त हृदयों को पूर्णतृप्त व आह्लादित करता रहा। देश-देशान्तर के मनीषी, सिद्धसंत, महन्त, काव्यकला प्रवीण एवं संगीतज्ञों का यहाँ मेला लगा रहता था। गोस्वामी तुलसीदास, भक्तिमती मीरावाई, रहीम, अजबकुंँअरि आदि भक्तों ने यहाँ आकर श्री श्रीनाथजी के दर्शनकर अपने को कृतार्थ किया। संसार के भौतिक सुखों को त्यागकर ब्रजरज में ही आत्मसात करने वाले भक्त रसखान भी इसी मंदिर का स्पर्श परिष्कृत रूप हैं। मुगल सम्राट अकबर भी अपनी बेगम के साथ यहाँ आये थे। आमेर के राजा मानसिंह और उदयपुर व जोधपुर के राणाओं ने यहाँ आकर श्री श्रीनाथजी के दर्शन करके अपना मानव जन्म सफल व धन्य किया था।

मुगल सम्राट अकबर के पश्चात् यवन आक्रमणकारियों से आतंकित होकर मेवाड़ की वैष्णव भक्तिमती महिला गंगावाई श्री श्रीनाथजी को सम्वत् 1726वि0 के आश्विन पूर्णिमा शुक्रवार की अर्धरात्रि में यहाँ के समस्त सेवकों के साथ आगरा, कोटा, बूँदी, जोधपुर होती हुयी दो वर्ष, चार माह, सात दिन की अवधि वाली लंबी यात्रा पूर्ण करके संवत् 1728वि0 के फाल्गुन कृष्णा सप्तमी शनिवार में मेवाड़ पहुँची। जहाँ पर मेवाड़ के महाराणा की सेवा सुरक्षा में श्री श्रीनाथजी नाथद्वारे में विराजे और आज भी पूर्ण वैभव के साथ विराजमान हैं। श्री गिरिराज गोवर्धन पर बना हुआ ठा0 श्री श्रीनाथजी का मंदिर अपनी बनावट से आतातायी यवनों के लिये दुर्मेद्य रहा, जिससे उन्होंने उसे क्षतिग्रस्त नहीं कर पाया था। वह आज भी वैसा ही उदासीन भाव से खड़ा हुआ है।

नाथद्वारे में विराजमान रहते हुए भी ठा0 श्री श्रीनाथजी ने अपनी परमप्रिय प्राकट्य स्थली और श्री गिरिराज पर्वत पर बने मंदिर को पूर्णतः त्यागा नहीं है। बल्कि नित्य संबंध बनाये रखने के लिये नाथद्वारे से संध्या आरती के पश्चात् वे यहाँ नित्य ही आते हैं और दूसरे दिन यहाँ से प्रातः की मंगला आरती में भक्तों को दर्शन देने के लिए वहाँ पघार जाते हैं। इसी आशय से आज भी नाथद्वारे में श्री श्रीनाथजी को गोवर्धन आने के लिए संध्या को नित्य ही स्वर्णरथ सजाया जाता है, जिसमें रजत बैल जुड़े होते हैं। दूसरे दिन प्रातः मंगला आरती के समय वही रथ व रजत बैल धूल घूसित देखे जाते हैं। इधर श्री गिरिराज पर्वत पर बने मंदिर में यहाँ के सेवक (पुजारी) के द्वारा संध्या को शयन आरती करके श्री श्रीनाथजी को शयन करने के लिये चन्दन का पलंग बिछाकर उस पर सुन्दर विछावन सजाया जाता है। जो दूसरे दिन प्रातः पलंग वर विछा हुआ विछावन अस्त-व्यस्त सा मिलता है। इस प्रकार पुष्टि सम्प्रदाय की भक्ति भावनानुसार श्री श्रीनाथजी आज भी यहाँ श्री गिरिराज पर्वत पर स्थित अपने मंदिर में नित्य रात्रि को शयन करते हैं।

आज यहाँ श्री श्रीनाथजी के ंमदिर में संवत् 1576 वि0 से संवत् 1726वि0 तक वाला वह वैभव नहीं है। यवन आक्रमणकारियों के भय ने उसका संपूर्ण वैभव छीन लिया है, फिर भी वह अपने पूर्व वैभव की स्मृति को अपने हृदय में संजोये हुए उदासीन भाव उसे अपने को सुरक्षित बनाये हुए अपने ठा0 श्री श्रीनाथजी के आने की वाट जोहता एकटक भाव से देखता हुआ मूर्तिवत् खड़ा हुआ हैं।

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