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बैसाखी – 2018

vaisakhi

वैसाखी एक प्राचीन फसल त्यौहार है  जिसे पंजाब क्षेत्र में सभी पंजाबियों द्वारा उनके धर्म की परवाह किए बिना मनाया जाता है। पंजाब के लोगों, विशेषकर सिखों के लिए, वैसाखी एक महत्वपूर्ण दिन है। हिंदू सोलर कैलेंडर के आधार पर वैसाखी को सिख नए साल के रूप में मनाया जाता है।

वैशाखि महोत्सव, नानकशाही या सिख कैलेंडर के अनुसार, वैसाख (अप्रैल-मई) के महीने में 1 दिन मनाया जाता है। इस कारण से, वैसाखी को वैसाखी के रूप में भी जाना जाता है अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, बेसाखी की तारीख हर साल 13 अप्रैल और 14 अप्रैल के बीच हर 36 वर्षों में एक बार होती है। वैसाखी तिथि में यह अंतर इस तथ्य की वजह से है कि वैसाखी के दिन को सौर कैलेंडर के अनुसार माना जाता है, न कि चंद्र कैलेंडर।

Baisakhi

मान्यता है कि गुरु गोविंद सिंह ने वैशाख माह की षष्ठी को खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिस कारण बैसाखी पर्व मनाया जाता है। गुरु गोविंद सिंह ने इस मौके शीशों की मांग की, जिसे ‘दया सिंह, धर्म सिंह, मोहकम सिंह, साहिब सिंह व हिम्मत सिंह’ ने अपने शीशों को भेंट कर पूरा किया। इन पांचों को गुरु के ‘पंच-प्यारे’ कहा जाता है, जिन्हें गुरु ने अमृत पान कराया।

बैसाखी के अवसर पर मेले भी आयोजित किए जाते हैं। जो सिख सभ्यता व संस्कृति का प्रमाण देते है। युवक-युवतियाँ अग्नि जलाकर लोक-नृत्य करते व एक-दूसरे को बधाई देते। इस पर्व के अन्य विशेष आकर्षण निम्न हैं:

  • इस दिन पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है।
  • शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फसल की खुशियाँ मनाते हैं।
  • पूरे देश में श्रद्धालु गुरुद्वारों में अरदास के लिए इकट्ठे होते हैं। मुख्य समारोह आनंदपुर साहिब में होता है, जहाँ पंथ की नींव रखी गई थी।
  • सुबह 4 बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है।
  • दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाने के बाद गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बैठाया जाता है। इसके बाद पंच प्यारे ‘पंचबानी’ गाते हैं।
  • दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है।
  • प्रसाद लेने के बाद सब लोग ‘गुरु के लंगर’ में शामिल होते हैं।
  • श्रद्धालु इस दिन कारसेवा करते हैं।
  • दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंच प्यारों के सम्मान में शबद् और कीर्तन गाए जाते हैं।

 

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इतिहास

प्रकृति का एक नियम है कि जब भी किसी जुल्म, अन्याय, अत्याचार की पराकाष्ठा होती है, तो उसे हल करने अथवा उसके उपाय के लिए कोई कारण भी बन जाता है। इसी नियमाधीन जब मुगल शासक औरंगजेब द्वारा जुल्म, अन्याय व अत्याचार की हर सीमा लाँघ, श्री गुरु तेग बहादुरजी को दिल्ली में चाँदनी चौक पर शहीद कर दिया गया, तभी गुरु गोविंदसिंहजी ने अपने अनुयायियों को संगठित कर खालसा पंथ की स्थापना की जिसका लक्ष्य था धर्म व नेकी (भलाई) के आदर्श के लिए सदैव तत्पर रहना।

पुराने रीति-रिवाजों से ग्रसित निर्बल, कमजोर व साहसहीन हो चुके लोग, सदियों की राजनीतिक व मानसिक गुलामी के कारण कायर हो चुके थे। निम्न जाति के समझे जाने वाले लोगों को जिन्हें समाज तुच्छ समझता था, दशमेश पिता ने अमृत छकाकर सिंह बना दिया। इस तरह 13 अप्रैल,1699 को श्री केसगढ़ साहिब आनंदपुर में दसवें गुरु गोविंदसिंहजी ने खालसा पंथ की स्थापना कर अत्याचार को समाप्त किया।

उन्होंने सभी जातियों के लोगों को एक ही अमृत पात्र (बाटे) से अमृत छका पाँच प्यारे सजाए। ये पाँच प्यारे किसी एक जाति या स्थान के नहीं थे, वरन्‌ अलग-अलग जाति, कुल व स्थानों के थे, जिन्हें खंडे बाटे का अमृत छकाकर इनके नाम के साथ सिंह शब्द लगा। अज्ञानी ही घमंडी नहीं होते, ‘ज्ञानी’ को भी अक्सर घमंड हो जाता है। जो परिग्रह (संचय) करते हैं उन्हें ही घमंड हो ऐसा नहीं है, अपरिग्रहियों को भी कभी-कभी अपने ‘त्याग’ का घमंड हो जाता है।

अहंकारी अत्यंत सूक्ष्म अहंकार के शिकार हो जाते हैं। ज्ञानी, ध्यानी, गुरु, त्यागी या संन्यासी होने का अहंकार कहीं ज्यादा प्रबल हो जाता है। यह बात गुरु गोविंदसिंहजी जानते थे। इसलिए उन्होंने न केवल अपने गुरुत्व को त्याग गुरु गद्दी गुरुग्रंथ साहिब को सौंपी बल्कि व्यक्ति पूजा ही निषिद्ध कर दी।

 

विभिन्न नामों और विभिन्न अनुष्ठानों और समारोहों के तहत भारत भर में वैसाखी की शुभ तारीख मनाई जाती है। बसाखी की तारीख असम में ‘रोंगली बिहू’ के साथ, बंगाल में ‘नाबा बारशा’, तमिलनाडु में पुथंडू और केरल में ‘पूम विश्ू’ के साथ मेल खाती है।

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बैसाखी – 2018&rdquo पर एक विचार;

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