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केतु ग्रह के उपाय

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केतु (U+260B.svg) भारतीय ज्योतिष में उतरती लूनर नोड को दिया गया नाम है। केतु एक रूप में राहु नामक ग्रह के सिर का धड़ है। यह सिर समुद्र मन्थन के समय मोहिनी अवतार रूपी भगवान विष्णु ने काट दिया था। यह एक छाया ग्रह है।माना जाता है कि इसका मानव जीवन एवं पूरी सृष्टि पर अत्यधिक प्रभाव रहता है। कुछ मनुष्यों के लिये ये ग्रह ख्याति पाने का अत्यंत सहायक रहता है। केतु को प्रायः सिर पर कोई रत्न या तारा लिये हुए दिखाया जाता है, जिससे रहस्यमयी प्रकाश निकल रहा होता है।

हिन्दू ज्योतिष में केतु अच्छी व बुरी आध्यात्मिकता एवं पराप्राकृतिक प्रभावों का कार्मिक संग्रह का द्योतक है। केतु विष्णु के मत्स्य अवतार से संबंधित है। केतु भावना भौतिकीकरण के शोधन के आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्रतीक है और हानिकर और लाभदायक, दोनों ही ओर माना जाता है, क्योंकि ये जहां एक ओर दुःख एवं हानि देता है, वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति को देवता तक बना सकता है। यह व्यक्ति को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ने के लिये भौतिक हानि तक करा सकता है। यह ग्रह तर्क, बुद्धि, ज्ञान, वैराग्य, कल्पना, अंतर्दृष्टि, मर्मज्ञता, विक्षोभ और अन्य मानसिक गुणों का कारक है। माना जाता है कि केतु भक्त के परिवार को समृद्धि दिलाता है, सर्पदंश या अन्य रोगों के प्रभाव से हुए विष के प्रभाव से मुक्ति दिलाता है। ये अपने भक्तों को अच्छा स्वास्थ्य, धन-संपदा व पशु-संपदा दिलाता है। मनुष्य के शरीर में केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। ज्योतिष गणनाओं के लिए केतु को कुछ ज्योतिषी तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानते हैं जबकि कुछ अन्य इसे नर ग्रह मानते हैं। केतु स्वभाव से मंगल की भांति ही एक क्रूर ग्रह हैं तथा मंगल के प्रतिनिधित्व में आने वाले कई क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व केतु भी करता है। यह ग्रह तीन नक्षत्रों का स्वामी है: अश्विनी, मघा एवं मूल नक्षत्र। यही केतु जन्म कुण्डली में राहु के साथ मिलकर कालसर्प योग की स्थिति बनाता है।

केतु के अधीन आने वाले जातक जीवन में अच्छी ऊंचाइयों पर पहुंचते हैं, जिनमें से अधिकांश आध्यात्मिक ऊंचाईयों पर होते हैं। केतु की पत्नी सिंहिका और विप्रचित्ति में से एक के एक सौ एक पुत्र हुए जिनमें से राहू ज्येष्ठतम है एवं अन्य केतु ही कहलाते हैं।

कुण्डली में विभिन्न भावों में केतु की उपस्थिति

जातक की जन्म-कुण्डली में विभिन्न भावों में केतु की उपस्थिति भिन्न-भिन्न प्रभाव दिखाती हैं।

  • प्रथम भाव में अर्थात लग्न में केतु हो तो जातक चंचल, भीरू, दुराचारी होता है। इसके साथ ही यदि वृश्चिक राशि में हो तो सुखकारक, धनी एवं परिश्रमी होता है।
  • द्वितीय भाव में हो तो जातक राजभीरू एवं विरोधी होता है।
  • तृतीय भाव में केतु हो तो जातक चंचल, वात रोगी, व्यर्थवादी होता है।
  • चतुर्थ भाव में हो तो जातक चंचल, वाचाल, निरुत्साही होता है।
  • पंचम भाव में हो तो वह कुबुद्धि एवं वात रोगी होता है।
  • षष्टम भाव में हो तो जातक वात विकारी, झगड़ालु, मितव्ययी होता है।
  • सप्तम भाव में हो तो जातक मंदमति, शत्रुसे डरने वाला एवं सुखहीन होता है।
  • अष्टम भाव में हो तो वह दुर्बुद्धि, तेजहीन, स्त्रीद्वेषी एवं चालाक होता है।
  • नवम भाव में हो तो सुखभिलाषी, अपयशी होता है।
  • दशम भाव में हो तो पितृद्वेषी, भाग्यहीन होता है।
  • एकादश भाव में केतु हर प्रकार का लाभदायक होता है। एस प्रकार का जातक भाग्यवान, विद्वान, उत्तम गुणों वाला, तेजस्वी किन्तु उदर रोग से पीड़‍ित रहता है।
  • द्वादश भाव में केतु हो तो जातक उच्च पद वाला, शत्रु पर विजय पाने वाला, बुद्धिमान, धोखा देने वाला तथा शक्की स्वभाव होता है।

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केतु ग्रह के अशुभ फल में सुधार हेतु उपाय करने हेतु शनिवार एवं मंगलवार का दिन और रात का समय  सबसे उपयुक्त होता है। जिनका केतु कुंडली मैं शुभ स्तिथि मैं नहीं है उन्हें शनिवार एवं मंगलवार के दिन व्रत करना चाहिए और गरीब व्यक्ति को भर पेट भोजन कराना चाहिए।

केतु ग्रह के उपाय

  • गणेश जी की सेवा और पूजा करे
  • गणेश द्वादश नाम स्तोत्र का पाठ करें।
  • केतु के मूल मंत्र – “ऊं कें केतवे नम:” का रात्रि में 40 दिन में 18,000 बार जप करें।
  • कपिला गाय, लोहा, तिल, तेल, सप्तधान्य शस्त्र, बकरा, नारियल, उड़द आदि का दान करने से केतु ग्रह की शांति होती है।
  • केतु से सम्बन्धित रत्न का दान (लहसुनिया)भी उत्तम होता है।
  • मंदिर में काले और सफेद रंग का कम्बल दान करना चाहिए।
  • कुत्ते को मीठी रोटी दें एवं ब्राह्मणों को भात खिलायें इससे भी केतु की दशा शांत होगी।
  • किसी को अपने मन की बात नहीं बताएं
  • बड़े बुजुर्गों की सेवा करने से भी केतु की दशा में राहत प्रदान होती है।
  • सोने की बालियां पहने।

केतु ग्रह के उपाय शनिवार एवं मंगलवार के दिन पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ करना चाहिए तो केतु ग्रह के अशुभ फल से मुक्ति मिलती हैं।

केतु कवच

II केतु कवचम् II
अथ केतुकवचम्
अस्य श्रीकेतुकवचस्तोत्रमंत्रस्य त्र्यंबक ऋषिः I
अनुष्टप् छन्दः I केतुर्देवता I कं बीजं I नमः शक्तिः I
केतुरिति कीलकम् I केतुप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः II
केतु करालवदनं चित्रवर्णं किरीटिनम् I
प्रणमामि सदा केतुं ध्वजाकारं ग्रहेश्वरम् II १ II
चित्रवर्णः शिरः पातु भालं धूम्रसमद्युतिः I
पातु नेत्रे पिंगलाक्षः श्रुती मे रक्तलोचनः II २ II
घ्राणं पातु सुवर्णाभश्चिबुकं सिंहिकासुतः I
पातु कंठं च मे केतुः स्कंधौ पातु ग्रहाधिपः II ३ II
हस्तौ पातु श्रेष्ठः कुक्षिं पातु महाग्रहः I
सिंहासनः कटिं पातु मध्यं पातु महासुरः II ४ II
ऊरुं पातु महाशीर्षो जानुनी मेSतिकोपनः I
पातु पादौ च मे क्रूरः सर्वाङ्गं नरपिंगलः II ५ II
य इदं कवचं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् I
सर्वशत्रुविनाशं च धारणाद्विजयि भवेत् II ६ II
II इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे केतुकवचं संपूर्णं II

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार केतु कवच के नियमित जाप से भगवान केतु को खुश करने और आशीर्वाद देने का सबसे शक्तिशाली तरीका है।

सबसे अच्छे परिणाम पाने के लिए आपको स्नान के बाद और भगवान केतु की तस्वीर के सामने शाम को केतु कवच का पाठ करना चाहिए।

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