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महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर

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श्री महालक्ष्मी मंदिर भारत देश के हिंदू धर्म के अनुसार में पुराणों में सूचित किया हुआ विभिन्न शक्ति पीठों मैं एक है और महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है। इन पुराणों के अनुसार, शक्ति पीठों में शक्ती माँ उपशिथ होकर जन कल्याण के लिये भक्त जनों का परिपालन करती है। भारत में स्थित छे शक्ती पीठों में कोल्हापुर मैं स्थित शक्ति पीठं बहुत ही सुप्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ जो भी अपने विचारों को प्रकट करता है वो तुरंत माँजी के आशीर्वाद से पूरा हो जाता है या उस व्यक्ति मुक्ति पाकर उसका जनम सफल हो जाता है। भगवान विष्णु के पत्नी होने के नाते इस मंदिर का नाम माता महालक्ष्मी से जोड़ा हुआ है और यहाँ के लोग इस जगह में महाविष्णु महालक्ष्मी के साथ निवास करते हुए लोक परिपालन करने का विशवास करते है।

कन्नड़ के चालुक्य साम्राज्य के समय में या की करीब ७०० ऐडी में इस मंदिर का निर्माण हो ने का अनुमान किया गया है। एक काला पत्थर के मंच पर, देवी महालक्ष्मीजी की चार हस्थों वाली प्रतिमा, सिर पर मकुट पहने हुए बनाया गया है और गहनों से सजाया हुआ मकुट लगभग चालीस किलोग्राम वजन का अथ्भुत प्रदर्शन है। काले पत्थर में निर्मित महालक्ष्मी की प्रतिमा की ऊंचाई करीब 3 feet है। मंदिर के एक दीवार में श्री यंत्र पत्थर पर खोद कर चित्र बनाया गया है। देवी की मूर्ति के पीछे देवी की वाहन शेर का एक पत्थर में बना प्रतिमा भी मौजूद है। देवी के मुकुट में भगवान विष्णु के शेषनाग नागिन का चित्र भी रचाया गया है। देवी महालक्ष्मी के चारों हाथों में अमूल्य प्रतीक वस्तुओं को पकड़ते दिखाई देते है। निचले दाहिने हाथ में निम्बू फल धारण किये (एक खट्टे फल), ऊपरी दाएँ हाथ में गदा () के साथ (बड़े कौमोदकी जो अपने सिर जमीन को छुए), ऊपरी दाई हाथ में एक ढाल (एक खेटका) और निचले बाएँ हाथ में एक कटोरे लिए (पानपात्र) देखें जातें है। अन्य हिंदू पवित्र मंदिरों में देवीजी पूरब या उत्तर दिशा को देखते हुए मिलते हैं लेकिन यहाँ देवी महालक्ष्मीजी पश्चिम दिशा को निरीक्षण करते हुए मिलते है। वहाँ पश्चिमी दीवार पर एक छोटी सी खुली खिड़की मिलती है, जिसके माध्यम से सूरज की किरणें हर साल मार्च और सितंबर महीनों के 21 तारीख के आसपास तीन दिनों के लिए देवीजी की मुख मंडल को रोशनी करते हुए इनके पद कमलों में शरण प्राप्त करते हैं।

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इसी मंदिर के अन्दर नवग्रहों, भगवान सूर्य, महिषासुर मर्धिनी, विट्टल रखमाई, शिवजी, विष्णु, तुलजा भवानी आदी देवी देवताओं को पूजा करने का स्थल भी दिखाई देते हैं। इन प्रतिमाओं में से कुछ 11 वीं सदी के हो सकते हैं, जबकि कुछ हाल ही मूल के हैं। इसके अलावा आंगन में स्थित मणिकर्णिका कुंड के तट पर विश्वेश्वर महादेव मंदिर भी स्थित हैं।

नित्य पूजा: इस मंदिर में प्रत्येक रोज भगवान के प्रति पांच सेवायें प्रतिबन्ध लाब्धित है: पहले सेवा शुबह 05:00 बजे शुरू होता है, काकडा दिया जलाते हुए, भक्त जन भजन करते हुए और पुजारी लोग वैदिक मन्त्रों का उच्छाडन करते हुए भगवान को सुप्रभात की गाना बजाके जगाते हैं। शुबह 8 बजे दूसरा पूजा शुरू होता है, भगवान को शोडाशोपचारा पूजा करते हैं, जिसमें भगवान को 16 तरह के उपचार करके उनको पूजा किया जाता है। दोपहर में भी सेवायें होते है, शाम को भी सेवायें होते है और शेजारती पूजा तीसरा पूजा विधि होता है, रात में मनाया जाता है।

प्रत्येक पूजाक्रम : हर शुक्रवार और पूर्णिमा के दिन देवीजी की उत्सव प्रतिमा मंदिर की प्रकारों में जुलूस की रूप में मंदिर को तीन बार प्रदक्षीण करते हुए ले जाते हैं।

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त्यौहार मानव जाती का जीवन रोशनी और सौभाग्य के साथ मिले झूले हैं और यह आश्चर्य की बात नहीं है की सूरज के किरणें भी माता महालक्ष्मीजी की चरण कमलों को छूते हुए हर साल दो बार निकल जाते हैं . कोल्हापुर श्री महालक्ष्मी मंदिर निर्माण करते वक्त, इस अतभुत दृश्य को संभावित करने के लिए हम इस मंदिर को बनाने वालों का खूब तारीफ़ करना चाहिए, जिन्होंने ऐसी प्रभावता दिखाया है। उन्हों ने इस मंदिर को ऐसा बनाया की सूरज की रौशनी देवीजी के पद कमल स्पर्श करते देवीजी की आदर करें. “किरणोंत्सव” के दिन इस विशेष घटना को देखने के लिये भारत की कोने कोने से हर साल हजारों लोग मनाने के लिए कोल्हापूर महालक्ष्मी मंदिर पर पहुँच जाते हैं। हर साल यह त्योहार शाम में निम्नलिखित दिन पर मनाया जाता है: (जनवरी 31 फ़रवरी 1 फ़रवरी 2) और (9 नवम्बर 10 नवम्बर 11 नवंबर)

यह कहा जाता है कि सूर्य भगवान हर साल दो बार महालक्ष्मीजी की चरण छूकर पूजा करके आदर करने के लिए यहाँ पहुँच जाते हैं। ‘रथ सप्तमी’ की अवसर पर इस घटना संभावित होता है, लगभग हर साल जनवरी की माह में ऐसा होता हैं। यह 3 दिन के लिए मनाया जाता हैं। पहले दिन, सूरज की किरणें देवीजी की पैरों पर गिरता है, दूसरे दिन, देवता के मध्य भाग को छूते हैं और तीसरे दिन देवीजी के मुख मंडल को रोशनी करती हैं, जो की एक अतभुत दृश्य हैं। हजारों साल पहले ही ऐसी सोच विचार करके जिन लोगों ने इस मंदिर को बनाया, उनके श्रद्धा और विचारों का यह एक अनमोल भेंट है, जो आज भी लोग बहुत प्रशंसा करने लायक हैं। पेशवाओं के राज्य पालन के समय के दौरान में भी उनके परिवार मंदिर की मरम्मत और पूजा करने में बहुत हिंसा दिखाया. हालांकि, भारत के इस भाग में कई हमलों होने के कारण, सुंदर मूर्तियां, जो मंदिर के चारों ओर देखने मिलते हैं, नुक्सान होने का कारण हैं।

 

महालक्ष्मि अष्टकं

महालक्ष्मी अष्टकम के हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार नियमित रूप से देवी महालक्ष्मी को खुश करने और उसके आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे शक्तिशाली तरीका है।

 

महालक्ष्मी अष्टकम का उच्चारण कैसे करें

सबसे अच्छे परिणाम प्राप्त करने के लिए सुबह स्नान करके और देवी लक्ष्मी आइडल या तस्वीर के सामने महालक्ष्मी अष्टकम का जिक्र करना चाहिए। आपको सबसे पहले अपने प्रभाव को अधिकतम करने के लिए महालक्ष्मी अष्टकम को हिंदी में समझना चाहिए।

महालक्ष्मी अष्टकम के लाभ

महालक्ष्मी अष्टकम की नियमित जप मन की शांति देती है और अपने जीवन से सारी बुराई दूर रखती है और आपको स्वस्थ, धनी और समृद्ध बनाती है।

“ॐ महालक्ष्म्यै च विधमहे विष्णु पतनाये च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात।”

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