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छठ पूजा – छठ में हर एक दिन का महत्व

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बिहार और यूपी के कई इलाकों में मनाए जाने वाले छठ पर्व की शुरुआत हो चुकी है. छठ का त्‍योहार एक साल में दो बार मनाया जाता है. पहली बार ये त्योहार चैत्र महीने में और दूसरी बार कार्तिक महीने में आता है. भगवान सूर्य की उपासना के साथ छठ पर्व की शुरुआत होती है. हिंदू धर्म में किसी भी पर्व की शुरुआत स्नान के साथ ही होती है और ये पर्व भी स्नान यानी नहाय-खाय के साथ होता है. कार्तिक महीने में छठ मानने का विशेष महत्व है।

छठ पर्व सूर्य देव की उपासना के लिए प्रसिद्ध है। दिवाली के बाद सबसे बड़ा त्योहार आता है छठ पूजा। इस पर्व को कई नामों से जाना जाता है जैसे छठ. छठी, डाला छठ, डाला पूजा, सूर्य षष्ठी। ये पर्व सूर्य और उसकी शक्ति को समर्पित होता है। इस दिन लोग सूर्य को अच्छी सेहत देने, खुशियां और उनकी रक्षा करने के लिए धन्यवाद करते हैं। छठ का भोजपुरी में अर्थ होता है छठा दिन। कार्तिक महीने की चतुर्थी से शुरू होकर सप्तमी तक मनाया जाने वाला ये त्यौहार चार दिनों तक चलता है। मुख्य पूजा कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की छठी के दिन की जाती है। इस वर्ष छठ पूजा का पर्व 24 अक्टूबर से शुरु होकर 27 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। मुख्य पूजा 26 अक्टूबर को की जाएगी। छठ पूजा उत्तर भारत खासकर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। इस दौरान सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है। इस दिन सूर्य की भी पूजा की जाती है। माना जाता है जो व्यक्ति छठ माता की इन दिनों पूजा करता है छठ माता उनकी संतानों की रक्षा करती हैं।

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पहला दिन

छठ पर्व का पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है.नहाय-खाय के मौके घर की पूरी तरह से सफाई की जाती है. शुद्ध शाकाहारी भोजन बनाते हैं. इस दिन व्रती महिलाएं स्नान और पूजा-अर्चना के बाद कद्दू व चावल के बने प्रसाद को ग्रहण करती हैं।

दूसरा दिन

खरना, छठ पूरा का दूसरा दिन होता है. इस दिन खरना की विधि की जाती है. खरना का मतलब है पूरे दिन का व्रत. व्रती महिला या पुरुष इस दिन जल की एक बूंद तक ग्रहण नहीं करते हैं. खास बात ये है कि खरना का प्रसाद नए चूल्हे पर ही बनाया जाता है. शाम होने पर गन्ने का जूस या गुड़ के चावल या गुड़ की खीर का प्रसाद बना कर बांटा जाता है।

Hindu devotee prays while standing in waters of Arabian Sea as she worships Sun god Surya during "Chhath Puja" in Mumbai

तीसरा दिन

छठ व्रत के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ जिसे टिकरी भी कहते हैं. इसके अलावा चावल के आटे से बने लाडुआ बनाते हैं. इस दिन शाम का अर्घ्य दिया जाता है.आज पूरे दिन के उपवास के बाद शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. मान्‍यता के अनुसार शाम का अर्घ्य के बाद रात में छठी माता के गीत गाए जाते हैं और व्रत कथा भी सुनी जाती है।

चौथा दिन

कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को अ‌र्घ्य दिया जाता है. छठ पर्व के चौथे और अंतिम दिन सुबह का अर्घ्य दिया जाता है. चौथे  दिन सुबह सूर्य निकलने से पहले ही घाट पर पहुंचना होता है और उगते सूर्य को अर्घ्य देना होता है. अर्घ्य देने के बाद घाट पर छठ माता से संतान-रक्षा और घर परिवार के सुख शांति का वर मांगा जाता है।

छठ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को ही क्यों मनाया जाता है, किसी और दिन क्यों नहीं? छठ-पूजा की कई कथाओं में से एक एक कथा का मूल प्रश्न यह है. इस कथा की मानें तो राजा प्रियंवद को कोई संतान ना थी. महर्षि कश्यप की शरण में गए, पुत्रेष्टि यज्ञ हुआ और यज्ञाहुति की खीर राजा ने पत्नी मालिनी को खिलाई. यज्ञ के पुण्य-प्रभाव से पुत्र तो हुआ लेकिन मृत।

अंत्येष्टि को श्मशान घाट पहुंचे राजा प्रियंवद पुत्र-वियोग में प्राण त्यागने को तत्पर हुए. दैव से यह दुख देखा ना गया. करुणा के वशीभूत एक देवी देवसेना प्रकट हुईं, कहा, ‘सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं. राजन! तुम मेरा पूजन करो, बाकी लोगों को भी प्रेरित करो.’ राजा ने इस देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई. कथा के मुताबिक यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी, सो अब तक चलन जारी है।

दूसरी कथा है कि कृष्ण के वंशज शाम्ब को ऋषि दुर्वासा के श्राप से कुष्ठ रोग हो गया था। शापमुक्ति के लिए उन्होंने सूर्य-पूजा की और निरोगी हुए। यही पूजा आज लोकधर्म में छठ-पर्व के रुप में विख्यात है।

एक और कथा है कि लंका विजय के बाद राम की अयोध्या वापसी के दिन दिवाली हुई और इसके छह दिन बाद यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन राम-राज्य की स्थापना हुई। राम और सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की. सप्तमी को विधिपूर्वक पारण कर भगवान सूर्य का आशीर्वाद लिया, तब से रामराज की स्थापना का यह दिवस छठपूजा के रुप में प्रचलित है।

यह रामराज्य क्या है? दैहिक, दैविक और भौतिक दुखों का जहां वास नहीं वही रामराज्य है! तुलसीदास की उक्ति है ना कि- ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज काहू ना व्यापा!’ छठपूजा की चाहे जितनी कथा बना लें, हर कथा के केंद्र में होगी कामनाएं- संतान, निरोगी-निर्मल काया, और अन्न-धन-जन से भरपूर जीवन यानी की राम-राज।

लेकिन नहीं, बात इतना भर कहने से नहीं बनती. दैहिक, दैविक, भौतिक त्रिविध ताप (दुखों) की अनुपस्थिति की प्रार्थना के स्वर वाला ‘छठ’ हम पुरबियों के बीच घनघोर पारिवारिकता का भी पर्व है। इस एक मामले में छठ पूरब में मनाए जाने वाले शेष पर्वों से अलग और विशिष्ट है. याद करें, छठ से तुरंत पहले पड़ने वाले पर्व तीज और जीऊतिया (ज्ञानीगण कहेंगे, जीवितपुत्रिका!) या फिर शारदीय नवरात्र को ही।

जीऊतिया जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक मां के विशिष्ट रुप से अपनी संतान की जीवन-कामना के निमित्त की गई प्रार्थना है. तीज ‘सुहाग’ यानी अखंड दांपत्य-भाव (आप्टे के शब्दकोश में ‘सौभाग्य’ शब्द इसी अर्थ में आता है) के निमित्त मनाया जाता है. नवरात्रि यानि जगदंबा को पूजने की नौ रातें अपने मूल रुप में शरीर-घट में सुप्त शक्ति के जागरण (योग की शब्दावली में कहें तो कुंडलिनी-जागरण) की अराधना है. इसका भाव होता है, जग के कल्याण में अपने कल्याण की कल्पना करना. इन पर्वों में परिवार होता तो है लेकिन हाशिए पर ही. वह सहायक होता है, केंद्र में नहीं होता. तीज, जीऊतिया और नवरात्र- तीनों में साधक के तौर पर व्यक्ति ही प्रधान है।

ये है छठ पूजा तिथि

नहाय-खाय- 24 अक्टूबर
खरना- 25 अक्टूबर
डूबते सूर्य को अर्घ्य- 26 अक्टूबर
उगते सूर्य को अर्घ्य- 27अक्टूबर

छठ पूजा 2017 : मुहूर्त समय
छठ पूजा के दिन इस समय होगा सूर्यादय – 06:41 बजे सुबह
छठ पूजा के दिन इस वक्त होगा सूर्यास्त- 06:05 बजे शाम

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छठ पूजा – छठ में हर एक दिन का महत्व&rdquo पर एक विचार;

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